साहित्य

पति

नीलम राकेश

उसका पति
जानता है उसे
मारता है उसे
नीली पड़ी देह पर
चढ़ जाता है अधिकार से
सिसकती है वो, संताप से!

इसका पति
घूरता है इसे
डर से कांपती है
थरथराती हुई देह से
हर साल बच्चा जने जाती है
कसमसाती है वो, इस बंधन में!

ये पति
जानता है इसे
महसूस करता है इसे
देख पाता है देह के पार
उसके वंश बेल की जननी है
खिलखिलाती है ये, प्यार से!

हे ईश,
ये तीसरा पति
ही देना सबको
देख सके जो देह के पार
महसूस करे उसके जज्बात
कलकल बहती नदी सी चहकेगी वो हर पल!

तुम्हारी अनमोल कृति!!!

नीलम राकेश
लखनऊ

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