साहित्य

प्याज की आत्मकथा

श्रीकांत यादव

मैं सब्जी की सरताज,
सलाद की महारानी हूँ।
परतें जो मेरी छीलते,
मैं उनके आंखों में पानी हूँ।।

छौंक लगे पर छींक निकालती,
काटे जाने पर तो आंसू।
कच्ची खाइए स्वाद निराला,
तलने भुनने पर तो धांसू।।

मैं सब्ज होऊं या ना होऊं,
मेरे पत्ते शर्तिंयां सब्ज ही होते हैं।
हरी सब्जी को तो गांठ रोपते,
गांठ के लिए बीज ही बोते हैं।।

सरकारों के माथे का बल हूँ,
मध्यवर्ग के रसोई की नूर हूँ।
चुनाव का बहुमूल्य मुद्दा मै,
मंहगाई में गरीबों से दूर हूँ।।

मैं हद नहीं अनहद भी हूँ,
मुझमें सरकार बदलने की क्षमता है।
दिल्ली वालों से पूछ कर देखो,
सब जानती वहाँ की जनता है।।

मैं अमीरी की तो ठाट हूँ,
मैं गरीबी की भी प्रतिकार हूँ।
मैं शाकाहारियों की प्यारी,
मांसाहारियों का पहला प्यार हूँ।।

मैं आयात निर्यात में लोचा हूँ,
किसानों की खुशहाली मुझमें है।।
देश विदेश से आती जाती ,
मुझे रोकने की क्षमता किसमें है।।

आंदोलन तक मेरी पकड़ है,
गले में हार बन इठलाती हूँ।
विपक्षी नेता जब उपहार में देते,
पुलिस सुरक्षा लो सिखलाती हूँ।।

सटोरियों आढतियों की प्यारी मैं,
तेजडियों मंदडियों की दासी हूँ।
नमक रोटी से जो मुझे हैं खाते,
कभीं खुशी तो कभीं उदासी हूँ।।

मैं स्थिरता का बंधन न मानती,
मेरे कीमत में भी लोचा है।
सरकार भी मेरी कीमत न जानें,
न गरीब जनता ने ही सोचा है।।

कुटिल कलेवर मगर मेरे नहीं,
मैं भी राजनीति की ही मारी हूँ।
मैं उस किसान को कुछ न दे पाती,
जिसके खेत की राज दुलारी हूँ।।

राजनीति मैं पहले भी थी,
सियासत ही तो आज हूँ।
सौ सौ रूपये किलो बिकने वाली,
यदुवंशी बता दो मैं प्याज हूँ।।

श्रीकांत यादव
(प्रवक्ता हिंदी)
आर सी 326, दीपक विहार
खोड़ा, गाजियाबाद
उ०प्र०!

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