साहित्य

प्रकृति

शोभना झा

ख़ामोश होकर कर्म वो करती,
फिर भी इंसानों को क्यों नहीं भाती।

पेड़ पौधों से तोड़ लिया इंसानों ने नाता,
ताल तलैया का कलकल पानी भी उसको अब नहीं भाता।

लोलुपता में इतना अंधा क्यों हो गया है इंसान,
समझ में नहीं आ रहा है, क्यों कर रहा अपना ही नुकसान।

चिड़ियों की भी चहचहाहट अबसुनाई कहां देती है,
दूर दूर तक सिर्फ गगनचुंबी इमारतें ही दिखाई पड़ती है।

श्वास भी उसी से है, आस भी उसी से है,
आज भी उसी से है, कल भी उसी से है।

निस्वार्थ होकर कर्म वो करती,
शरण वो सबको अपनी गोद में देती,
भरण पोषण वो सबकी करती,
फिर भी इंसानों को क्यों नहीं भाती।

शोभना झा

इंदिरापुरम, गाजियाबाद

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