साहित्य

प्रथम मिलन की सुखद कल्पना

श्रीकांत यादव

स्वर लहरियां उठतीं मन में,
चित्त मचल मचल इठलाता है |
कोमल संवेग भरकर भावना से,
सुख स्वप्न मधुर दिखलाता है ||

मोहक चित्र उभरता अंतर में,
धडकन सांसों की बल खाती |
लज्जा युक्त लालिमा चेहरे पर,
हृदय की तडपन झलकाती ||

अधर फड़क फड़क से जाते ,
किसलय से खिलते रह जाते |
हाथ हटाते रहते अलकों को,
सब बातें संकेत से कह जाते ||

शरमातीं पलकें उठते गिरते,
ज्वार हृदय सिंधु में उठता है |
मोहक पाश में बंध नयनों के,
पुलकित सांस क्रम बिगडता है ||

सपने समक्ष साकार देखकर,
मन चितवन मे थर थर होती |
प्रथम मिलन की कोमल कल्पना,
धैर्य मन खोता धडकन बढती ||

तन सिहर सिहर रह जाता है,
कुछ क्षण भी घंटों से लगते हैं |
प्रथम मिलन की अभिलाषा में,
पल काटे से नहीं कटते हैं ||

मूक मतवाली अव्यक्त आकांक्षा,
बढती क्षण प्रतिक्षण अानंद लिए |
सयत्न सहेजना पड़ता मन को,
जैसे लगता मदिरा मदमस्त पिए ||

प्रियतम संग हो पवित्र मिलन ,
हो राह कांटों की परवाह नहीं |
सजा रखा जो सुकोमल कल्पना,
है अधीर चेतना का निर्वाह कहीं ||

देख फल भूखे की भूख मिटी कब,
है मलता हाथ कुछ रीत न जाए |
काटे जो वक्त सुखद कल्पना में,
आया मधुमय पल बीत न जाए ||

औपचारिकता से आक्रोश है बढ़ता,
अनौपचारिकता का ले अवलंब वहां |
यदुवंशी मिलन की इस बेला में,
कौन चाहता अधिक विलंब यहां ||

अभिलाषा की हो परिपुष्टि यदि,
क्षणभंगुरता में अमृतत्त्व यहीं |
जीवन की कुछ व्यापकता में,
गाढ़ा है मिलन का स्वत्त्व कहीं ||

श्रीकांत यादव
(प्रवक्ता हिंदी)
आर सी-326, दीपक विहार
खोड़ा, गाजियाबाद
उ०प्र०!

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