साहित्य

वादा

हम को वादे पे तेरे कुछ भी ऐतबार नहीं।
हाँ मगर दिल पे मेरा कोई इख़्तियार नहीं।

वादा करियेगा बहुत सोच समझ कर मुझसे,
अपने वादे से मुक़र जाना बार बार नहीं।

उसकी तस्क़ीन की ख़ातिर किया झूठा वादा,
इसलिए हम कोई झूठे या गुनहगार नहीं।

इश्क़ बन्ध पाया है कब जाल में वादों के यहाँ,
यह इबादत है कोई मिस्र का बाज़ार नहीं।

तेरे वादों के इशारों पे फिदा है ये जहाँ,
मेरी पायल के घुंघरुओं में है झन्कार नहीं।

तन्हा छोड़ोगें सफ़र मे नहीं वादा करिए,
हमसफ़र तुम हो तो कोई सफ़र दुश्वार नहीं।

अपनी मेहनत से लगन से बनॆ पहचान मेरी,
दोगले लोगों के वादों की है दरकार नहीं।

तू जो मिल जाये मेरा प्यार ‘अमर’ हो जाये,
मैं किसी और की दुनिया में तलबग़ार नहीं।

देवप्रिया ‘अमर’ तिवारी
दुबई, यूएई
स्वरचित और मौलिक रचना

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