साहित्य

रीमा महेंद्र ठाकुर की कलम से

मुस्कुराहट

एक तस्वीर मांगी थी, हर खुशी दे दी!
ये जिंदगी तूने, मेरी तकदीर दे दी!!

कई सपनो मे रहते है, तुझमे सिमट कर!
वही आकाश नीला सा,सितारों के जहाँ पर, !!

कई मुद्दत हुई तन्हा, बेजार सी रातें, !
नही है नीदं आंखो में, बडी खमोश रातें!!

मुकम्मल है जहाँ मेरा, मगर कुछ तो कमी है!
अब तो खमोश है रातें, तन्हा सी जमीं है!!

चलो एक बार उसके शहर मे रूककर जरा देखे!
जो आती है नजर खुशियाँ, क्यू आंखों मे नमी है!!

किया था वादा जो उसने, खुश लम्हो खोकर,!
उसी मुस्कान मे तो मेरी दुनिया बसी है!!

उस मर्म को न कह पायी

हर बार तुम्हारी यादें, हर बार तुम्हारी आंखे!
हम उनमें ही खो जाये, हर बार तुम्हारी बातें!!

वो रातो की तन्हाई, न नीदों की भरपाई!
जो मर्म छिपा इस दिल मे, उस मर्म को न कह पायी!!

न वक्त है न वो साथी, न दीप की वो फिर बाती, !
अब उर मे दर्द समाया है, अब तो फैली तन्हाई है!!

उन लम्हो का पागलपन था, जिनमें बसता भोलापन था!
एक चादर ओढी सपनो की, बूदें भर आयी है!!

सावन आने मे देरी है, कुछ बाते अभी अधूरी है!
बस एक बार बतला जाओ, क्यू खामोशी अब छायी है!!

श्रीमती रीमा महेंद्र ठाकुर

लेखिका
रानापुर झाबुआ मध्यप्रदेश भारत

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