साहित्य

रेखा रानी की कलम से

रुनझुन पायल


सुन सजनी तेरी रुनझुन पायल।
कर जाती है मेरे मन को घायल।
अरे तुम देर न लगाया करो।
मुझे और न तरसाया करो।
मेरे पास चली आया करो।
सीधे सांसों में समाया करो।
हम तेरी इसी अदा के कायल।
कर जाती है मेरे मन को घायल।
सुन सजनी तेरी रुनझुन पायल।
तुम चुपके से आया करो,
पायल यूं न बजाया करो।
मेरी दिल की अटरिया में,
तुम आन बसो गोरी।
किंतु मैं आऊं कैसे
बजती रुनझुन पायल मेरी
पायल उतार के आया करो।
मुई इसी अदा के तो
गोरी हम हैं कायल।
कर जाती है मेरे मन को घायल।
सुन सजनी तेरी रुनझुन पायल।
चंदा की चांदनी में
तेरा महकता ये यौवन
मद होश करे गौरी
मुझको ये तेरा यौवन।
संगीत हैं जीवन का,
तेरी रुनझुन पायल।
कर जाती है मेरे मन को घायल।
सुन सजनी तेरी रुनझुन पायल।

खनकेंगी दौलत की फसलें

खनकेंगी दौलत की फसलें,
फूल खिलेंगे तब रुपयों के।
मां की बातों से हो असहमत,
मैं भिड़ाने चली अब तो जुगत।
मैंने अपनी गुल्लक से ,
सिक्के अनगिनत निकाले।
पहले से तैयार भूमि में ,
चुपके से सारे बो डाले।
प्रतिपल तत्पर सेवा में,
खाद ,पानी भर भर डाले।
भूले से भी बंध्य धरा में,
कोई न अंकुर कोंपल वाले।
जो सिक्के अंदर थे माटी में,
ऊपर से बस घास जमी थी।
हाय हताशा बाबरिया सी ,
होकर अब तो रोने लगी थी।
मुंह लटकाए घूम रही थी
पापा से तब ग्रंथि खोली,
चिपक हिय से मन भर रोली।
तब पापा ने सब समझाया ।
मेहनत का प्रतिफल समझाया।
सजीव निर्जीव का भेद बताया।
रेखा तब मैंने तब यह माना,
श्रम से सुंदर बीज पनपते।
सपनों की फसलें महकेंगी।
बस तुम श्रम करते जाना,
जीवन में नित बढ़ते जाना।

रेखा रानी
विजय नगर गजरौला,
जनपद अमरोहा,उत्तर प्रदेश।

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