साहित्य

सब हथियार आजमाते चमचे

श्रीकांत यादव

चमची चमचे बड़े काम के,
काम आसान बनाते चमचे |
खाना मुंह तक पहुंच सके,
पहले उसे चख जाते चमचे ||

बड़े बर्तन का बड़ा काम है,
हो जाए पूर्ण तब आते चमचे |
विविध विविध प्रकार के बर्तन हैं,
उनसे अपना जोड़ते नाते चमचे ||

शूल हृदय में चुभता है जब,
पौ बारह ही कर जाते चमचे |
करा धरा सब मिट्टी हो जाता,
बेशर्म ध्वजा लहराते चमचे ||

राग द्वेष वैमनस्य निकटता,
और दण्ड भेद अपनाते चमचे |
भेद नीति और कूट नीति के,
सब हथियार आजमाते चमचे ||

ड़रने वालों को ड़र दिखलाते,
ताकतवर से हाथ मिलाते चमचे |
जाति एकता का दम भरकर,
उनको भी प्रसाद चखाते चमचे ||

मुश्किल जैसी बात अगर हो,
उसमें भी जुगत भिड़ाते चमचे |
आसान समझ जो करना चाहे,
उसमें भी टांग अड़ाते चमचे ||

ज्ञानी विद्वान और कर्मशील से,
अपने को उत्तम बताते चमचे |
अफसरों से डींग हांक हांक कर ,
अपनी विसात बिछाते चमचे ||

अंदर बाहर हर एक नांके पर ,
आफिस तक पैठ जमाते चमचे |
साहब हुक्काम हुक्मरानों तक,
अपनी सब बात मनवाते चमचे ||

सहकर्मियों को धता बताकर,
खोटा सिक्का चलवाते चमचे |
अपना मर्म जानने वालों को,
गुटवालों से बुरा बतलवाते चमचे ||

चुगलखोरी और गुटबाजी में,
बहुमूल्य समय बिताते चमचे |
अच्छे अच्छों को धता बताकर,
सबकी नाक मे दम कराते चमचे ||

मान सम्मान सब ईश्वर हाथ में,
इस पर भी हाथ लगाते चमचे |
यदुवंशी जो चाहें वह कर बैठें,
बिल्कुल नहीं घबराते चमचे ||

श्रीकांत यादव
(प्रवक्ता हिंदी)
आर सी-326, दीपक विहार
खोड़ा, गाजियाबाद
उ०प्र०!

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