साहित्य

सबका अस्तित्व यही है

श्रीकांत यादव

हमसफर बहुत थे
सबका अलग हौसला था
आसमान के जैसे पंछी
कुछ का न अपना घोंसला था
सबकी मंजिलें थी अलग
सबकी उड़ान एक जैसी
आशाओं का दामन थामे
कुछ उड़ रहे थे
कुछ चल रहे थे
थे सभी मुसाफिर
चले इस राह में
अपने किस्मत के द्वारे।

चिंताएं बहुत बड़ी थीं
अनुभव भी तनिक नहीं
हो रहे थे दरबदर
जरा भी इसकी भनक नहीं
कोई न था चारा
बिल्कुल हो बेसहारा
मिल जाए कोई मंजिल
चले थे इस चाह में
भटकें न राह में
बहुत कुछ सोचे बिचारे
अपने किस्मत के मारे।

दुनिया जैसे मुसाफिरों की
सब तरह का मुसाफिर खाना
जिंदगी का यही दस्तूर
कोई निश्चित नहीं ठिकाना
कुछ नसीबों के धनी
कुछ बदकिस्मती के मारे
चार चांद किसी के हिस्से
किसी को दिन में दिखते तारे
चलती का नाम जिंदगी
जिंदगी के लाचारे
सब उम्मीदों के सहारे।

एक लता सी जिंदगी
ले लपेट बढ़ती
जमीन से उठे जो
किसी पेड़ पर चढ़ती
बढ़ा सके जो वृक्ष
चढ़ी उस लता को
माफ कर सके जो
उसकी खता को
दे सके जो ऊर्जा
जो दे सके रवानी
फलीभूत हो उठती
बस वहीं जिंदगानी
सबका अस्तित्व यही है
एक दूसरे के सहारे
सब कहीं न कहीं हैं
किसी दरिया के किनारे।

श्रीकांत यादव
(प्रवक्ता हिंदी)
आर सी-326, दीपक विहार
खोड़ा, गाजियाबाद
उ०प्र०!

100% LikesVS
0% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!