साहित्य

श्रद्धांजलि (भाग एक)

कबीर के प्रति

वीणागुप्त

काव्य-अंबर में दमका ,
सूरज सम संत कबीर।
अनंत लालिमा से जिसने ,
मेटी हर तमस लकीर।

जिसके अंतर में बाजे,
नित ही अनहद-मंजीर।
मानवता का है मसीहा,
रोए, देख पराई पीर।

दुल्हनिया वह राम की,
बैठा है ओढ़ चदरिया ,
निर्गुन प्रेम- रस भीनी।
सहजभाव से बुनता जाए
वह कविता झीनी-बीनी।

उसकी बेबाक बयानी,
नदिया का बहता पानी।
सब को निर्मल करता ,
तोड़े हर लीक पुरानी ।

ले लुकाठी वह खड़ा है।
हर अन्याय से भिड़ा है।
उसके अनगढ़ शब्दों ने
ज़िंदगी को गढ़ा है।

अक्खड़ वह ,मस्तमौला,
युग चेता, वह दीवाना।
वह कलाकार सच्चा ,
झुकना न उसने जाना।

उसे मोह -माया नहीं है,
वह सच्चा और सही है ।
वह मर्म धर्म का जाने ,
उस जैसा कोई नहीं है।

वीणागुप्त
नई दिल्ली

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