साहित्य

श्रद्धांजलि भाग -दो

सूरदास के प्रति

वीणा गुप्त

कृष्ण काव्य के अमर गायक।
तुम कृष्ण-भक्ति के उन्नायक।
सूर सूर्य सा आलोक तुम्हारा।
प्रवहमान वत्सल-रसधारा

तुम रंग और छवि का संसार।
तुम दिव्य -चक्षु, वेणु झंकार।
तुम राधा की प्रणय-केलि हो।
मोहन की मोहक मनुहार।

तुम जसुमति के ममत्व की छाया।
तुम कान्हा की नटखट माया।
तुम भ्रमर कृष्ण चरण -कंवल के ।
दर्शक कृष्ण -लीला स्थल के।

गोपाल सखा तुम गोचारण के।
तुम साक्षी इंद्र गर्व -हरण के।
भक्त अनन्य तरण-तारण के ।निर्मल ,उज्ज्वल ,शुचि दर्पण से।

तुम साकार अभिव्यक्ति विनय की।
प्रेम -सख्य की मृद परिभाषा।
जमुन- जल में प्रति पल बिंबित,
तुम श्याम- सलोने की सुगाथा।

ब्रज भाषा की माधुरी मनहर
भाव और रस संगम सुंदर।
तेरी वाणी में हुई तरंगायित,
कला धन्य हुई तुझको पाकर।

वीणा गुप्त
नई दिल्ली

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