साहित्य

सतरंगी सपने

श्वेता अरोडा
गुडिया थी वो सयानी सी,दुनिया की चालाकी से अनजानी सी!
सपने थे उसके भी सतरंगी से,देखे थे उसने रंग बिरंगी से!
आया एक हवा का झौंका,दिया किस्मत ने ऐसा धोखा!
बिखर गई दुनिया सारी,उजड गई सारी फुलवारी!
भूल गई वो खेलना हंसना,बस अब तो था उसको जीवन ढोना!
नही चाहती थी वो अब जीना,मां बिना नही अब मुझको रहना!
अपने पराए का हुआ अहसास, किया सभी ने उसको निराश!
भरी दुनिया मे हुई वो बेगानी सी,जाने पर मां के उसकी दुनिया हुई वीरानी सी!

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