साहित्य

सवि शर्मा की कलम से

डॉक्टर

ना दिन को चैन मिलता है
ना नींद रात को मिलती है
मानवता सँवरकर इनके
नित ह्रदय पट सँवरती है

समर्पित भाव सेवा करते
इंसानियत के रूप में सजते
टूटने लगी जब साँस पलछिन
हौसलों के जीवन में रंग भरते

ईश के बाद आपका स्थान है
पर स्वभाव भगवान सा है
निज सुख छोड़कर खड़े रहते
दुख दर्द में विश्वास आपका है

बचाते तुमको अपना जीवन हार गया
इंसान वो भी जंग बीमारी से हार गया
खड़ा रहा था तत्पर सेवा में तुम्हारी
देवदूत अमर हो कर्म मानवता कर गया

कितने घंटे पी पी किट में क़ैद रहा
भूख प्यास और अपनों से दूर रहा
बच्चे पापा को मिलने तरसते थे
नींद थकान से लड़ते थकता रहा

करे श्रधांजलि समर्पित भगवान को
मानवता के सही पुजारी ऐसे इंसान को
व्याप्त ना हो धरा पर कही अंधेरा
मिटा गए जो जीवन मानव उत्थान को

वृक्षारोपण

निज स्वार्थ में जंगल सारे तबाह किए
अपने रहने ख़ातिर घर परिंदो के तबाह किए

साँस लेना हुआ दूभर जीवन गति अवरोध हुआ
मौसम चक्र इन कृत्यों प्रभाव से बाधित हुआ

मानव मन भरी दया और भरी अमानवता भी
अमानवता धर रूप विकराल किया तांडव

देख भारी तबाही चिपको आंदोलन शुरू किया
कुछ स्वार्थी तत्वों ने उसको भी विफल किया

मनाए उत्साह भर हरेला त्योहार धूम धाम से
बड़े लगाए पेड़ खुद और लगवाए बच्चों बुजुर्ग से

दे खाद पानी और पर्याप्त पोषण धूप का
संरक्षण करे उस नन्हे से प्यारे पोधे का

होगा तैयार विशाल साम्राज्य वन सम्पदा का
भरा होगा जीवन में ख़ुशियों के ख़ज़ाने का

निज स्वार्थ त्याग कर पोधो को बचाना है
आने वाली पीढ़ी को संदेश यही सिखाना है

विधि का खेल नही मानव कर्म प्रत्युत्तर है
रोग महामारी फैले निज कर्म प्रत्युत्तर ही है

सवि शर्मा
देहरादून

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