साहित्य

शहर में अजनबी हूँ

पद्मा मिश्रा

माँ !तुम्हारी याद आती है ,
तुम्हारा गाँव ,गलियां ,देहरी छत सा बड़ा आंगन
हवा में गूंजती वो आरती की जोत वाली धुन,
वो ‘माँ ‘की आरती गाना ,वो श्रद्धा से भरी आँखें ,
फिजां में तैरते वो श्लोक सारे याद आते हैं ,
शहर में अजनबी हूँ ,माँ !तुम्हारी याद आती है ,
तुम्हारे हाथ जो बुनते ,उलझते ऊन के धागे ,
न उलझी जिन्दगी की डोर ,,ममता से भरी आँखें ,
तुम्हारे मौन में डूबे नयन माँ ,याद आते हैं .
शहर में अजनबी हूँ ,माँ !तुम्हारी याद आती है ,
कभी हमने नहीं जानी थीं सुख दुःख-सी बड़ी बातें,
कहाँ ढलता है दिन ,और कौन सारी रात जगता है ,
कभी दुःख की नहीं ओढ़ी,जरा भी हमने परछाईं ,
तुमने सुख सदा बांटे ,दुखों की चोट खुद खाई ,
तुम्हारे स्नेह के अनमोल पल माँ,याद आते हैं
शहर में अजनबी हूँ ,माँ !तुम्हारी याद आती है ,
अजानी जिंदगी की राह में कांटे बहुत आये
हृदय की पीर बन उमड़े दुखों के , दर्द के साये
तुम्हारी छांव आंचल की बहुत मां याद आती है


पद्मा मिश्रा

जमशेदपुर झारखंड

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