साहित्य

शरद कुमार पाठक की कलम से

कविता की खोज

ढूंढ रहा था मैं तुमको
इस हृदय की उठती लहरों में।

कभी ढूंढ़ता घर आँगन में
शिल्प गढ़ी प्राचीरों मे।

कभी ढूंढ़ता तुम्हें कुटुम में
जीवन की नीरस भरी कथाओं में।

कभी ढूंढ़ता रजनीपत में
सुरभित गंध हवाओं में।

कभी ढूंढ़ता शाखाओं में
कोंपल हरी लताओं में।

कभी ढूंढ़ता वन उपवन
उड़ती रज गलियारों में।

कभी ढूंढ़ता सूरचाप में
अम्बर की छटा निराली में।

कभी ढूंढ़ता नव विहान में
रविरथ की उजियारी में।

ढूंढ रहा था मैं तुमको
इस हृदय की उठती लहरों में।

कभी ढूंढ़ता हूं पतझड़ में
ऋतु बसंत की फुलवारी में।

तुम्हें निहारुंँ नील गगन में
ऊँचे शिखर पहाड़ों में।

कभी खण्डहर कभी हवेली
कहीं दूर वीराने में।

कभी ढूंढ़ता बैठ अकेले
गहन काल्पनिक भावों में।

ढूंढ रहा था मैं तुमको
इस हृदय की उठती लहरों में।

कभी ढूंढ़ता सुख दु:ख में
अस्रु भरे इन नयनों में।

कभी हास परिहास में ढूँढूं
कभी ओज की झन्कारों में।

कभी अतीत के पल में ढूंँढूं
नीरवता की गलियों में।

कभी खेत खलिहान में ढ़ूंँढूं
बैलों की घुंघुरू के झन्कारों में

कभी काल्पनिक कभी प्रत्यक्ष घटित
भावों के उद्गारों मे।

ढूंढ रहा था मैं तुमको
इस हृदय की उठती लहरों में।

गीत उद्गगम

मेरे मनके प्रांगण में
जब गीतों का
उद्गगम- होगा
फूटेगें नव अंकुर
भावों से
गीतों का उत्सव होगा
हर्ष प्रफुल्लित मन होगा
गीतों का सावन बरसेगा
मेरे मनके प्रांगण में
जब गीतों का उद्गम होगा
शब्दकोष और
भाव अंकुरित
नव गीतों का
संगम होगा
भाव हृदय गति
सरिता सी
भावों में समरसता होगी
मेरे मनके प्रांगण
जब गीतों का उद्गम होगा
फूटेगें नव अंकुर भावों से
गीतों का उत्सव होगा

आये सावन

आये सावन
मन भावन उल्लासमयी
खुशियों के साथ
गूँज रहें हैं
स्वर गीतों के
झूले और डाली के साथ
मेघ सुनहरे झलक रहे हैं
सूर चाप खिलता आकाश
कोई अक्षत क्षीर चढ़ाये
कोई पूजा थाल संवारे
कोई खड़ा करबद्ध जोड़
विनती लिए प्रभू के द्वार
कोई गाये मधुर रागिनी
बांधे सुर सरगम की तान
कोइ पपिहिरी अधर दबाये
बांधे सात सुरों तान
आते सावन मन भावन
उल्लासमयी खुशियों
के साथ

शरद कुमार पाठक

डिस्टिक -(हरदोई)
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