साहित्य

सोचते रहना

कुन्दन कुमारी
सोचते रहना मनुष्य की प्रवृत्ति है,
यह सीखने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पहलू भी है,
सफल जीवन जीने के लिए सोचना जरूरी भी है,
पर हर वक्त बेफिजूल की बातों को क्यों ? सोचना,
इससे समस्या का समाधान तो नहीं होता है,
बल्कि स्वस्थ सेहत पर भी व्यवधान डालता है,
अब यह सोचना कि…..
लोग मेरे बारे में क्या सोच रहे हैं,
यह बात भी मैं ही सोचूं तो लोग क्या सोचेंगे?
रिश्ते के बारे में भी क्यों सोचूं?
रिश्ते को बचाना सिर्फ मेरी ही जिम्मेवारी है,
उम्मीद से ज्यादा किसी पर निर्भर हो जाना,
परिणाम होता है अपनी क्षमता को खो देना,
बीमार पड़ जाएंगे सोचते हैं तो सोचते रहिए,
अपनी हिफाजत के लिए परहेज ही बचाव, है
बाकी कुछ नहीं अपने हाथ है,
जो अपने बस में नहीं हो,
उसके बारे में सोचना ही गुनाह है,
बुढापा आने का खौफ है यदि,
तो एकदम नहीं डरिए,
महामारी से उबर पाएंगे ,
तब ना बुढ़ापा देख पाएंगे,
सोचने में मनाही नहीं है,
पर सोचिए सिर्फ साकारात्मक बातें,
शरीर को सशक्त करने के लिए,
भोजन आaराम और व्यायाम।
शांत चित्त रखने के लिए ,
चिंतन ,ध्यान,,आध्यात्मिक ज्ञान।।
कुन्दन कुमारी
बेगूसराय, बिहार

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