साहित्य

सुभाषिनी जोशी ‘सुलभ’ की कलम से

ग़ज़ल

प्यार हो तो प्यार का इजहार होना चाहिए।
यह आपस में न कभी उपकार होना चाहिए।

जीवन में निश्छल स्नेह नादां बच्चों से करो ,
मुख़्लिसी जिन्दगी का आधार होना चाहिए।

आओ हिलमिल करें सेवा मानवता की सभी,
लाचारों की जग में मनुहार होना चाहिए।

कोई भी नंगा भूखा ना रहे संसार में,
सब जरूरतों के लिए पुकार होना चाहिए।

कोई भी बुजुर्ग लावारिस हो न भटके कभी,
वृद्धों के लिए मन में विचार होना चाहिए।

बेरोजगारी

खाने को घर में दाना नहीं, बर्तन बजानें से क्या फायदा।
बूढ़ी माँ के लिए दवाई’ नहीं, आंसू बहानें से क्या फायदा।

किसी के लिए पूरा तन, ढ़कने पहननें तक के भी कपड़े नहीं ,
बच्चे अधनंगे रहते यहाँ , बाजार घुमाने से क्या फायदा।

बूढ़े बाप को बैठ समझाए, कुछ दिनों में काम मिल जाएगा,
अच्छे दिन भी आ जाएँगे, सब्जबाग दिखानें से क्या फायदा।

काम न पर जाने के पत्नी को दिये, प्रतिदिन नये-नये बहाने,
कहीं पर मजदूरी मिलती नहीं, सपने सजानें से क्या फायदा।

आखिर पत्नी व बच्चों को ही, झाड़ू , पोछा, बर्तन करना पड़ा,
बेरोजगारी के चलते, स्वाभिमानी बचानें से क्या फायदा।

सुभाषिनी जोशी ‘सुलभ’
इन्दौर मध्यप्रदेश

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