साहित्य

सूखे पत्तों की भी अपनी कीमत होती

डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव

शाख़ से पत्ते जो टूट के गिरते हैं इस ज़मी पर।
उनका वजूद कोई भी भले ही न रह जाता हो।

पेड़ों से होकर अलग सदा सूख ही तो जाते हैं।
कभी इधर कभी उधर वह हवा के संग जाते हैं।

बुहारते रहते हैं लोग अक्सर सफाई करते रहते।
घूरों में फेंकते कभी पाँस वाले गड्ढ़े में हैं रखते।

हरियाली भले नहीं दे सकते हैं अब वे सूखे पत्ते।
कीमत वाली चीज मगर देते रहते हैं हमको पत्ते।

गोबर संग सड़ जब पाँस वही बन जाते हैं पत्ते।
देशी खाद बन खेतों को उपजाऊ करते हैं पत्ते।

घूरों-कूड़ों के सफाई हेतु जब आग लगाई जाती।
पहले सूखे पत्ते जलते बाद सब कुछ जल जाती।

सूखे पत्तों को रखते हैं भड़भूँजे बड़ा सम्हाल के।
लाई दाना सभी भूँजते पत्ता ही आग में डाल के।

सर्दी के मौसम में हम सब इन्हें बटोर जलाते हैं।
हाथ सेंकते बैठे-2 आलू गंजी भी भूँज खाते हैं।

इन्हीं पत्तों के बदौलत दोना पत्तल सब हैं बनते।
इको फ्रेंडली कार्य करें ये एवं शुद्धता भी रखते।

इनसे फैले न कोई प्रदूषण ना हो पर्यावरण बुरा।
पत्ते की भी कीमत है ये गिरें पेड़ से या रहें जुड़ा।

डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
इंटरनेशनल एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर-नार्थ इंडिया
एलायन्स क्लब्स इंटरनेशनल,कोलकाता, इंडिया

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