साहित्य

तमाम उम्र तमन्नाओं के भंवर 49 में ही रहा मैं

डॉ . मुश्ताक़ अहमद शाह ” सहज़ “

तमाशाई नहीँ  हूँ जो साहिल
से  मन्ज़र देखूँ,
तूफ़ान से लड़ता हूँ, दरिया में
रहा करता हूँ,
तस्व्वुर बस तेरा ही लिये फ़िरता
हूं दिन रात,
नाम दिल की किताब में तेरा ही
लिखा करता हूँ,
मैं सदियों से बस काम मैं  ये ही
किया करता हुँ,
तमाम उम्र तमन्नाओं के भंवर
में ही रहा मैं,
तूफ़ां में घिरा,निगाह साहिल
पे रखा करता हूँ,
मुरव्वत से मिले वो मैं भी
मुहब्बत से मिलूंगा,
दुश्मनों के लिये वार में तैयार
रखा करता हूं,
कोई भी नहीं अपना सच
इस क़ायनात मैं,
तस्वीरे  मुश्ताक़  पास अपने
रखा करता हूँ,

डॉ . मुश्ताक़ अहमद शाह
” सहज़ “
हरदा मध्यप्रदेश

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