साहित्य

तृण तृण में रचा संजीवन है

श्रीकांत यादव

कभी देखकर छुपते थे जो,
अब हंस हंस कर देखते हैं |
जो छुप छुप कर देखते थे,
अब सरेआम मुसकाते हैं ||

कभी अपना जमाना था,
अब इनकी जिंदगानी है,
कभी अपनी जवानी थी ,
जवानी इनकी दिवानी है ||

छुप छुप कर बच्चे देखते,
लुक छुप आती जवानी है |
इसी लुका छिपी का जीवन है,
हम सबकी यही कहानी है ||

प्रकृति का तय नियम यही,
इसे फिर फिरकर दुहराना है |
हैं हम आज जिस जगह पर,
वहीं किसी और को आना है ||

वंश परंपरा की शर्त यही ,
यही सृजनशीलता कहलाती |
पीढी दर पीढी वंश वेलि की,
ऊपर ऊपर बस चढती जाती ||

इस अमर बेलि के पत्ते पत्ते,
झड़ खाद ऊर्जा बन दे देते हैं |
तना भी मृत मिट्टी बन जाता,
तब नव अंकुर जन्म ले लेते हैं ||

सृजनात्मकता के सभी पक्षधर,
भरते शिक्षा दीक्षा की हामीं हैं |
निर्मूल उन तत्वों का करना,
जिनमे बची कुछ खामीं हैं ||

जड़ से चेतनता विकसित,
पराग से निस्सृत जीवन है।
यदुवंशी अनजानी प्रकृति में,
तृण तृण में रचा संजीवन है॥

यहां सभी क्षणिक धरोहर हैं,
सभी प्रकृति की संरचना हैं |
सबको अस्तित्व को लड़ना है,
आए दुःख कष्टों से बचना है ||

सृजन जीवंतता का द्योतक है,
नूतनता की यही निशानी है |
प्रकृति शक्ति जब सृजती है,
चढ़कर आती तभी जवानी है ||

जरा नश्वरता से क्या लेना देना,
जीवन आनंद में क्या बाधा है |
आधे में लड़कपन बृध्दापन,
बस बचता ही केवल आधा है ||

पीढियों का तय नियम यही,
इसी पर चलते चलते जाना है |
डालों की कलियों के जैसे,
बन फूल महक मुरझाना है ||

श्रीकांत यादव
(प्रवक्ता हिंदी)
आर सी-326, दीपक विहार
खोड़ा, गाजियाबाद
उ०प्र०!

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