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सहानुभूति- सत्य या दिखावा

“तेरे मन के करुण भाव, भर जाते हैं आँखों में आँसू,
जा गिरते ये मेरे हृदय में,अविरल धारा बनते आँसू।।”

शाब्दिक रूप से, सहानुभूति का अर्थ है दूसरों के साथ भाव महसूस करना। यह दूसरों के साथ भावनाओं को बाँटने, समझने करने की प्रवृत्ति है। सहानुभूति वह अवस्था है जिसमें मनुष्य दूसरे की दुखद अनुभूति का अनुभव अपने शुद्ध हृदय से करता है ओर उससे उसी प्रकार महसूस करता है जिस प्रकार दूसरा व्यक्ति कर रहा हो। एक माँ जब अपने बच्चे तो कष्ट में देखती है तो उसका हृदय भी रो उठता है।संतान के दर्द को माँ जिस प्रकार महसूस कर पाती है उसी प्रकार सहानुभूति में हम दूसरे के दर्द को अपने दर्द की तरह महसूस करते हैं।


गौतम बुद्ध ने एक वृद्ध व्यक्ति, एक रोगग्रस्त व्यक्ति और एक मृत व्यक्ति को देखा। उनका मन इस दृष्टि से इस कदर व्याकुल हो गया कि वे वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु तीनों समस्याओं के समाधान के लिए जीवन भर खोज करने के लिए आगे बढ़े और महात्मा बुद्ध कहलाये।
आज के परिवेश में सच्ची सहानुभूति दिखाने वाले लोग बहुत कम रह गए हैं।अब सहानुभूति में भी कोई न कोई स्वार्थ ही छिपा मिलता है।

पिछले वर्ष का उदाहरण लीजिए,उत्तर प्रदेश के हाथरस में 19 साल की लड़की का गैंगरेप हुआ, जुबान काट दी और रीढ़ की हड्डी तोड़ दी गयी, लेकिन पुलिस ने मामले को दबाने की कोशिश की, मीडिया ने कोई आवाज़ नहीं उठायी, सरकार बिल्कुल खामोश रही।पीड़ित लड़की की एक सप्ताह से ज्यादा दिनों तक एफआइआर दर्ज नहीं हुई थी।क्या लोगों की,सरकार की,मीडिया की या महिला आयोग की,किसी की भी सहनुभूति उस लड़की को मिली।


अचानक मामले ने राजनीतिक मोड़ लिया।एक सरकार को दूसरी की गलती निकालने का मौका मिल गया। रातों रात बड़े बड़े मंत्री उस पीड़िता के घर पहुँचने लगे, मीडिया,समाज सब के दिल मे सहानुभूति पैदा हो गयी। रैली ,मोमबत्तियाँ जलाई गई, क्या क्या नही हुआ। ऐसी सहानुभूति हमारा देश हर साल किसी न किसी पीड़िता के प्रति दिखाते ही रहता है। लेकिन पड़ोस में हो रहे जुर्म को रोकने तक का प्रयास नहीं करता।


केवल किताबों में रह गया ये शब्द इतनी ताकत रखता है कि किसी व्यक्ति को जीने की नई राह दिखा सकता है, अँधेरों में उजाले की किरण भर सकता है। दो प्रेम भरे सच्चे दिल से निकले हुए शब्द किसी आशिर्वाद से कम नहीं होते।सच्ची सहानुभूति की कोई कीमत नहीं चुका सकता। आज मानव कल्याण के लिये, बेटियों की सुरक्षा, पशु पक्षी व प्रकृति को बचाने के लिए हमारा संवेदनशील होना बहुत आवश्यक हो गया है।तभी हम सबके प्रति शुद्ध हृदय से सहानुभूति रख पाएँगे और उनकी सहायतार्थ आगे बढ़ पाएँगे।

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