साहित्य

तुम भी संवर जाओ किसी दिन

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह “सहज़” 
गलियों में तेरी क़दम रखूंगा न कभी मैं भी
अहद से अपने जो मुकर जाओ किसी दिन।
ये तिशनगी बुझने का नाम कहाँ लेती है।
आँखों से अपनी पिला जाओ किसी दिन।
आँखों  के  रास्ते दिल में  ही   छुपा रखा है।
आँखों मे खुद को देख जाओ किसी दिन।
सनम आ जाओ बातें करेंगे दिल की तुमसे।
आरज़ू है दुनिया को भूल जाओ किसी दिन।
ज़िक्र  तेरा ही किया करता है ये  मेरा दिल।
मासूम है इसकी भी सुन जाओ किसी दिन।
बहुत नाज़ सबको  मेहबूब पे अपने  अपने।
मेरी जान तुम भी संवर जाओ किसी दिन।
बरिशे मौसम भी आ करके अब जाने को है।
चले जाना आ तो जाओ मुश्ताक़ किसी दिन।

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह “सहज़” 
हरदा, मध्यप्रदेश।

100% LikesVS
0% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!