साहित्य

उषा शर्मा त्रिपाठी की कलम से

हसीन ख़्वाब है जिंदगी…

इन मासुम आंखों का हसीन ख़्वाब है जिंदगी,
भुखे की भूख और प्यासे की प्यास है जिंदगी!

बचपन की बिंदास हंसी और जवानी में जोश है तो,
बुढ़ापे में बस एक खूबसूरत एहसास है जिंदगी!

कोई क्यों ना मर मिटे तेरी इस कातिल अदाओं पे,
मौत ही है मंजिल तेरी फिर भी तेरा नाम है जिंदगी!

इस बेदर्द जमाने से…

ना जाने क्या पाने की चाहत थी तेरे इस बेदर्द जमाने से,
जिसकी चाहत और उलझन में हम खोते चले खुद को!

मिटा दी हस्ती अपनी फिर भी कुछ ना पाया गया हमसे,
धज्जी-धज्जी बिखर गये ढुंढते फिरते हैं अपनी हस्ती को!

बस समझाने की बातें हैं इस जहां में रिश्ते नाते और वफ़ा,
दो फूल चढ़ा देंगे अर्थी पर सब अपना रिश्ता समझाने को!

तुझे खोने का ड़र कैसा..

कहीं से पाया ही नहीं तुझे मैंने तो तुझे खोने का ड़र कैसा,
तुम तो बसती हो रूह में मेरे फिर तुझसे विरह का ड़र कैसा!

क्यूं चाहत रखूं तुझसे मिलने की क्यूं ढुंढू गलियों और चौबारों में,
पा लुंगी मैं तुझे खुद में फिर तुझसे बिछुड़ने का ड़र कैसा!

कैद कर रखा है तुझको मैनें अपनी इन बोलती हुई आंखों में,
धड़कती हो हरपल मेरे दिल में फिर तेरे दूर जाने का ड़र कैसा

बरसों गुजर जाते हैं..

कहने को तो बहुत कुछ कह जाती है दिल की बातें मुझ से,
पर लबों पर आते- आते इन बातों के अंदाज बदल जाते हैं!

खुबसूरत लम्हों को दिल से जी लेने का नाम है जिंदगी,
पर तेरी दुनिया में हर पल रस्मों रिवाज़ बदल जाते हैं!

बस इक सांस का ही तो है फासला जिंदगी औ मौत में,
पर इस रहगुज़र पर चलते चलते बरसों गुजर जाते हैं

ढूंढता है ये बावरा मन..

बेगानों के इस जहां में किसी अपने को ढूंढता है ये बावरा मन,
इस जहां के रहगुज़र में हम खुद ही से बेगाने हो गये हैं ऐ जिंदगी!

बावरे दिल की धड़कन मुझसे ये कहे कि लम्हों में समेट लूं तुझको!
मरूस्थल से इस जहां में तुम भी मृगतृष्णा बन गयी हो ऐ जिंदगी!

बावरे से अल्फ़ाज मेरे बावरी सी ख्वाहिशें हर पल मुझसे ये कहे,
उम्र के कुछ लम्हें चुराकर तुम भी मेरे संग थोड़ा जी लो ऐ जिंदगी!
उषा शर्मा त्रिपाठी

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