साहित्य

विक्रांत चम्बली की कलम से

मर्यादा सामाजिक बंधन या अभिशाप

नैतिकता जंजीर पडी हो मर्यादा अभिशाप कहां।
मर्यादा के कारण ही हम करते हैं सत्कर्म जहां।।

नैतिक मर्यादाओं से ही समाज का उत्थान हुआ।
नैतिक मर्यादावादी को हर जगह सम्मान मिला।।

जब तक नैतिकता की बेड़ियां मर्यादा में पड़ी रहीं।
तब तक मर्यादा इस धरा पर धर्म, सच में खड़ी रही।।

मर्यादा अभिशाप बनेगी होगा तब सम्मान कहां।
मर्यादा के कारण ही हम करते हैं सत्कर्म जहां।।

मर्यादा की लीक पड़ी तब परंपरा का उदय हुआ।
इस धरा पर मर्यादा में अभिशापों का जन्म हुआ।।

मर्यादा दूषित होती तब यह अभिशाप कहातीं।
सारे गलत कर्मों को तब मर्यादा चादर उढाती।।

मर्यादायें अच्छी हैं जब तक मानवता होगी वहां।
मर्यादाओं के कारण ही करते हम सत्कर्म जाहां।।

त्रिकोणीय प्यार

हमारी मोहब्बत का एक अलग ही आधार था।
मुकाम तक कैसे पहुंचता त्रिकोणीय प्यार था।।

हम उनको चाहते रहे दिलो जान से।
पर वह कहीं और ही थे बे इंतहान से।।

मुकम्मल ना कभी भी हमारे प्यार का जहां हो पाया।
मोहब्बत वापस आने के इंतजार में मैं कहां से पाया।।

हम इंतजार करते रहे क्योंकि वह मेरा संसार था।
मुकाम तक कैसे पहुंचता जो त्रिकोणीय प्यार था।।

अपनी अपनी चाहत में भागते रहे पर कुछ ना मिला।
हम कभी भी सच स्वीकार न सके फिर कैसा गिला।।

प्यार हमेशा से ही मेरा उसके लिए ही बरसता रहा।
मैं उसके और वह किसी और के लिए तरसता रहा।।

वह हमसे मुस्कुराते थे यह उनका आभार था।
मुकाम तक कैसे पहुंचता त्रिकोणीय प्यार था।।

पुरुष

कर्तव्यों की जंजीरों में बंधा मैं विवश हूं।
इस वसुधा का निवासी मैं एक पुरुष हूं।।

मैं अपनी जिम्मेदारी निभाता चला गया।
अपने मन को अंतर में दबाता चला गया।।

संवेदनाएं दबा दीं मैंने कर्तव्यों को अपनाया।
त्याग मैं करता रहा फिर भी दोषी कहलाया।।

जीवन पथ पर चलने वाला अपूर्ण निष्कर्ष हूं।
अपनी इस धरती का वासी मैं एक पुरुष हूं।।

बचपन में सबने सिखाया कि तुम कभी रोना नहीं।
अंतर में अपने संवेदनाएं को एकदम बोना नहीं।।

बचपन से मुझको यही सब बताया गया।
मेरे अंतर मन को शिला सा बनाया गया।।

जीवन की राहों पर चलने वाला पथिक हूं।
अपनी इस धरा का वासी मैं एक पुरुष हूं।।

बस कमी मेरी इतनी रही दिखावा न किया।
अपने कर्तव्यों का कभी श्रेय मैंने न लिया।।

मैं अपने दिल के अरमानों को जता न सका।
मैं कभी अपने ह्रदय के भाव दिखा न सका।।

क्योंकि मैं अपने कर्म रूपी पथ का पथिक हूं।
अपनी इसी धरा का वासी मैं एक पुरुष हूं।।

कर्म

मानव कर्म हमेशा जीवन में प्रधान होते।
कर्मों के आधार से ही भविष्य तय होते।।

कर्म बिना इस दुनिया में फल कहां मिलता है।
बिना पेड़ लगाए फूल कभी नही खिलता है।।

कर्म हमारे जीवन उन्नति की प्रमुख निशानी है।
जिन्होंने सत्कर्म किए दुनिया उनकी दीवानी है।।

वैसे ही हम को मिलता जैसा हम बोते।
कर्मों के आधार से ही भविष्य तय होते।।

जीवन पथ की कर्म ही वह प्रमुख है रेखा।
उसी से जीवन में स्थान सभी का तय होता।।

कर्म करें अच्छे मन से फल भी अच्छा होगा।
जिसने जैसा कर्म किया वैसा ही फल भोगा।।

कभी-कभी ईर्ष्या में ही अपना सब कुछ खोते।
कर्मों के आधार से ही भविष्य हमारे तय होते।।

नाम – विक्रांत चम्बली
पता – ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
ईमेल पता – ndlodhi2@yahoo.com

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