साहित्य

विश्व गुरु भारत

    चंद्रप्रकाश गुप्त "चंद्र"

विश्व गुरु है भारत मेरा

हर पग पर है आध्यात्म का डेरा

मस्तक पर शुभ्र किरीट है जिसके

सागर निशि-दिन चरण पखारे उसके

अरुण रश्मि नित ओज निखारे

आरती जिसकी मयंक उतारे

भारत ने ही धर्म, अर्थ, काम,मोक्ष के ऋचा उचारे

हमने ही साम, दाम, दण्ड, भेद के ज्ञान विचारे

सब सुखी हों, स्वस्थ्य हों,सर्व निरोगी मंत्र उकारे

जग है परिवार हमारा, वसुधैव कुटुंबकम् के संकल्प हमारे

हम कहते सब धर्म महान हैं,बस जन कल्याण के मार्ग हैं न्यारे

हम में त्याग, तपस्या, सत्य, अहिंसा, करुणा के हैं योग घनेरे

भौतिकता पर आध्यात्मिकता का संयम,रखते हैं हम नित्य सबेरे

हमने ही बामन रूप धर तीन पगों में,तीन लोक नाप लिये थे

जहां राम के आदर्श कृष्ण के कौशल ने, असुरों के संहार किये थे

विश्व में शांति हेतु हमने ही, गौतमबुद्ध के उपदेश दिए थे

नई दुनियॉ॑ की जब नहीं खोज हुई थी, हमने सारे जीवन तंत्र सृजित किए थे

हम वैभवशाली कितने थे! दुनियॉ॑ सोने की चिड़िया हमें कहती थी

यहाॅ॑ सब सुखी, प्रसन्न थे, प्यार सौहार्द की सरिता कल-कल बहती थी

बहुत लुटेरों ने लूटा मुझको, बहुतों ने हम पर राज किया

पर हमारे, गौरव, गरिमा, ज्ञान को सबने अंगीकार किया

दुनियाॉ॑ हमें निहार रही,हम आज भी खड़े वैभव शक्ति शिखर पर हैं

आत्मनिर्भरता, स्वालंबन, विज्ञान, पराक्रम की हम तीव्र डगर पर हैं

हम विश्व गुरु थे, विश्व गुरु हैं, विश्व गुरु रहेंगे सदा

गुरु देता है ज्ञान, विवेक,हम जग को देते रहेंगे सदा

विश्व गुरु है भारत मेरा

हर पग पर है आध्यात्म का डेरा

मस्तक पर शुभ्र किरीट है जिसके

सागर निशि-दिन चरण पखारे उसके

      जय विश्व गुरु भारत

      चंद्रप्रकाश गुप्त "चंद्र"
             ( ओज कवि )
       अहमदाबाद, गुजरात
100% LikesVS
0% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!