आध्यात्मिकसाहित्य

“अथ श्री स्वर्ग ओ माई गॉड कथा”

__डॉ पुष्पलता मुजफ्फरनगर

विष्णुजी के दरवाजे पर सभी देवताओं, अप्सराओं , आत्माओं की लाइन लगी है।वे परेशान हैं ।अचानक क्या आफत आ गई पहले उन्होंने इंद्र से पूछा ,”तुम यहाँ क्या कर रहे हो ?स्वर्गाधिपति इसीलिए बनाया था जरा – जरा सी बात पर मुझे दुखड़ा रोने चले आओ ?”वे बोले ,”प्रभु बात जरा सी नहीं है।मेरा सिंहासन कोरोना में मरे कवियों ने छीन लिया है । उसे मंच बनाकर वे कवि सम्मेलन कर रहे हैं ।उन्होंने अन्य देवताओं से पूछा,” वे बोले प्रभु हमें कविताएँ- कहानियाँ सुना- सुनाकर ,अपने किस्से सुना- सुनाकर पागल कर डाला है ।”विष्णु बोले अप्सराएँ किस काम के लिए हैं? उन्हें नचाते वे मस्त हो जाते। अप्सराएँ बोली,” प्रभु हम वहाँ पागल हो जायेंगे ।90 /92 साल के कवि हमारे ऊपर बकवास कविताएँ लिख- लिखकर हमें ही सुना रहे हैं।हमारे नृत्य से ज्यादा उन्हें कविता, कहानियाँ लिखकर सुनाने में ज्यादा मजा आता है । ।”तो क्या हुआ देवता तो उससे भी ज्यादा उम्र के हैं ?”वे बोली, “प्रभु वे दिखते तो युवा और सुंदर हैं ।वे हमारे ऊपर कविताएँ तो नहीं लिखते ।प्रभु बोले ,”सरस्वती कहाँ हैं? लक्ष्मी बोली वे मुझसे पैसे लेकर अपने कुछ लाड़लों को पुरस्कार देने गई हैं ।”प्रभु बोले ,”नारद जल्दी जाकर उनसे पूछकर आओ इनका क्या किया जाए।”तब तक दर्शकों के अभाव में सभी कवि प्रभु के दरबार में पहुँच गए।प्रभु उनकी कविताओं के डर से भागकर भीतर दुबक गए ।वे उनके आसन पर मंच जमाकर कविताएँ सुनाने लगे।इंद्र ने कहा,” खामोश ,” वरना सबको बहरे होने का शाप दे दूँगा।” नारद हँसने लगे ।इंद्र बोले हँस क्यों रहे हैं मुनिवर ? नारद बोले,”हँस इसलिए रहा हूँ कि इनके कान तो पहले से ही काम नहीं करते ।गूंगे होने का शाप देते तो बात बनती ।आजकल धरती पर तो ये जुबान का काम भी उँगली से ले ले रहे हैं ,कानों की इन्हें जरूरत ही नहीं है।अलबत्ता असली कवियों को तो आँखों की भी जरूरत नहीं सूरदास उदाहरण हैं। इंद्र ने परेशान होकर कहा ,”आप जल्दी जाकर सरस्वती जी से समाधान पूछिये वे इन्हें संभालें । मेरा जीना मुहाल हो गया है।नारद सरस्वती जी के पास पहुंचकर बोले,” माते आपके साधकों -भक्तों से स्वर्ग की व्यवस्था चरमरा गई है।” मगर मेरे साधक ही कोरोना ने ज्यादा क्यों मारे?उनसे ही क्या दुश्मनी थी?माते उनसे कोरोना की दुश्मनी नहीं थी उन्हें कविता सुनाने ,गोष्ठियों में जाने की धसक थी ।उससे वे ज्यादा संक्रमित हुए।दूसरे वे खाट ,सोफे, बैड पर पड़े लिखते रहते हैं ।धूप, मेहनत की कमी में इम्युनिटी नहीं है ।उन्होंने इंद्र और विष्णु के सिंहासन के मंच बनाकर अपनी -अपनी गानी – सुनानी शुरू कर दी है ।उपाय बताइये।इसका उपाय मैं कैसे बता सकती हूँ ।जन्म- मरण- पालन का खाता तो ब्रह्मा- विष्णु- महेश के पास है ।उनका पुनर्जन्म करवाइये।समाधान पाकर, प्रणाम माते कहकर नारद ऊपर दौड़े और उनके पुनर्जन्म से समाधान की बात बता दी।सब कवियों का पुनर्जन्म होने से नए- पुराने मिलकर धरती पर कवियों- लेखकों की बाढ़ आ गई है।स्वर्ग में सारे देवतागण ,अप्सराएँ आदि धरती के हाल देखकर चकित हो रहे हैं । हँसते -हँसते लोटपोट होकर ओ माई गॉड कह रहे हैं। मरे हुए पत्रकार उनसे अब वे क्या करेंगे सवाल पूछना चाहते हैं मगर वे उनके उत्तर दिए बिना आगे बढ़े ,चले जा रहे हैं।सरस्वती वापिस लौटी तो नारद ने पूछा,”माते ये इतनी कहानियाँ- कविताएँ लिख कैसे लेते हैं ” सरस्वती हँसते हुए बोली, “जो नहीं लिख पा रहे वे दूसरों की तोड़- मरोड़कर या पुराने- नए कवियों की चुराकर ,काम चला रहे हैं।एक मरे हुए पत्रकार ने नारद से पूछा ,”लोग धन कमाने में पागल हैं , ये लिखने में पागल क्यों हैं ।जबकि धन ये भी पाना चाहते हैं।नारद बोले ,”ओ माई गॉड ये कैसे” -कैसे- कैसे सवाल पूछेंगे मैं कैसे जवाब दूँगा, सोचते हुए आगे बढ़ गए। मरे हुए कवियों को भगाने का इंतजाम तो देवताओं ने कर लिया अब मरे हुए पत्रकारों के इलाज पर मंत्रणा चल रही है।वे सवाल पूछ- पूछ कर उनका बुरा हाल बनाये हैं। वे ओ माई गॉड कह – कहकर भागे फिर रहे हैं।


डॉ पुष्पलता मुजफ्फरनगर

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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