आध्यात्मिक

नवमी सिद्धिदात्री च

आचार्य धीरज द्विवेदी “याज्ञिक”

नवरात्री के नवें दिन आदि शक्ति माँ दुर्गा के सिद्धिदात्री स्वरूप की उपासना की जाती है। मां भगवती दुर्गा की नवीं शक्ति हैं मां सिद्धिदात्री।
नवरात्र में नौ दिन तक मां भगवती का यथा शक्ति जो भी पूजन अर्चन किया जाता है उस पूजा उपासना का फल नवें दिन भगवती सिद्धिदात्री का पूजन हवन करने से फल स्वरूप सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है। सिद्धियां हासिल करने का उद्देश्य है जो साधक भगवती सिद्धिदात्री की पूजा नौ दिवस पर्यंत कर रहे हैं उन्हें नवमी के दिन सिद्धिदात्री का पूजन अवश्य करना चाहिए।
सिद्धि और मोक्ष देने वाली दुर्गा को सिद्धिदात्री कहा जाता है। नवरात्र के नौवें दिन जीवन में यश बल और धन की प्राप्ति हेतु इनकी पूजा की जाती है। तथा नवरात्रों की नौ रात्रियों का समापन होता है। माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति सिद्धिदात्री हैं, इन रूपों में अंतिम रूप देवी सिद्धिदात्री का होता है। देवी सिद्धिदात्री का रूप अत्यंत सौम्य है, देवी की चार भुजाएं हैं दायीं भुजा में माता ने चक्र और गदा धारण किया है,मां बांयी भुजा में शंख और कमल का फूल है। प्रसन्न होने पर माँ सिद्धिदात्री सम्पूर्ण जगत की रिद्धि सिद्धि अपने भक्तों को प्रदान करती हैं।
मार्कण्डेय पुराण में मां भगवती दुर्गा जी के सिद्धियों का वर्णन किया गया है-अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व एवं वशित्व- ये आठ सिद्धियां बतलाई गई हैं। इन सभी सिद्धियों को देने वाली सिद्धिदात्री मां हैं। मां के दिव्य स्वरूप का ध्यान हमें अज्ञान, तमस, असंतोष आदि से निकालकर स्वाध्याय, उद्यम, उत्साह, क‌र्त्तव्यनिष्ठा की ओर ले जाता है और नैतिक व चारित्रिक रूप से सबल बनाता है। हमारी तृष्णाओं व वासनाओं को नियंत्रित करके हमारी अंतरात्मा को दिव्य पवित्रता से परिपूर्ण करते हुए हमें स्वयं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति देता है। देवी पुराण के अनुसार, भगवान शिव ने इन्हीं शक्तिस्वरूपा देवी जी की उपासना करके सभी सिद्धियां प्राप्त की थीं, जिसके प्रभाव से शिव जी का स्वरूप अ‌र्द्धनारीश्वर का हो गया था।
इसके अलावा ब्रह्मवैवर्त पुराण में अनेक सिद्धियों का वर्णन है
जैसे – सर्वकामावसायिता,सर्वज्ञत्व,दूरश्रवण ,परकायप्रवेशन ,वाक्‌सिद्धि,कल्पवृक्षत्व, सृष्टि,संहारकरणसामर्थ्य ,अमरत्व, सर्वन्यायकत्व आदि कुल मिलाकर 18 प्रकार की सिद्धियों का हमारे शास्त्रों में वर्णन मिलता है। यह देवी इन सभी सिद्धियों की स्वामिनी हैं। इनकी पूजा से भक्तों को ये सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
मां दुर्गा जी के पूजा में नवमी तिथि को विशेष हवन किया जाता है। हवन से पूर्व सभी देवी दवाताओं एवं माता की पूजा कर लेनी चाहिए। हवन करते वक्त सभी देवी दवताओं के नाम से हवि यानी अहुति देनी चाहिए. बाद में माता के नाम से अहुति देनी चाहिए। दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोक मंत्र रूप हैं अत: सप्तशती के सभी श्लोक के साथ आहुति दी जा सकती है। अथवा नवार्ण मंत्र से कम से कम 108 बार अहुति देनी चाहिए।
आहुति पश्चात भगवती का उत्तर पूजन,आरती, पुष्पांजलि, क्षमा प्रार्थना आदि करना चाहिए ।
इस प्रकार पूजन-अर्चन कर भगवती को बारंबार प्रणाम करने से मां भगवती सिद्धिदात्री नौ दिवस पर्यंत किये गये पूजन-अर्चन, व्रत, उपासना आदि के फल को सहज ही आशिर्वाद स्वरूप अर्पण कर देती हैं।

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