आध्यात्मिक

शिव जी के पूजन द्वारा मानव को भोग एवं मोक्ष की प्राप्ति …..

शिवरात्रि पर्व पर विशेष लेख ~

सीमा गर्ग मंजरी

मनुष्य के लिए शिवपद को प्राप्त करना ही मोक्षपद कहा गया है |
जो व्यक्ति भगवान शिवजी के चरणों में भक्तिपूर्वक समर्पित हो जाते हैं |
वे परमेश्वर पद को पा जाते हैं
कान के द्वारा भगवान के नाम, रूप, गुण, और लीलाओं का श्रवण,
वाणी के द्वारा भगवान का भजन कीर्तन और मन के द्वारा भगवान का ही चिन्तन, मनन करने वाला व्यक्ति
अपने जीवन काल में विशिष्ट मनोरथों की सिद्धि को प्राप्त कर लेता है |

एक बार की बात है कि नारद जी रिषियों और देवताओं को भगवान विष्णुजी के समीप क्षीरसागर तट पर ले गये थे |
तब वहाँ भगवान विष्णुजी ने देवताओं के हित स्वरूप भगवान शिवजी को कल्याणप्रद बतलाते हुये कहा था कि ~
जो व्यक्ति भगवान शिवजी की पूजा उपासना में लगे हुये हैं और मन से शिवजी को प्रणाम करते हुये अपने मन में शिवजी का ही चिन्तन करते रहते हैं |
ऐसे भक्तिमय भक्त कभी भी दुख, क्लेश जैसे जंजालों में नहीं फँसते |
जो व्यक्ति अपनी मनोकामनाओं में सुन्दर घर परिवार वाले, अलौकिक प्रतिष्ठा, संतति, आरोग्यता, मोक्षफल और भगवान
शिवजी की भक्ति चाहते हैं तो उन्हें नित्य भक्ति परायण होकर भगवान शिवजी और शिवलिंग की पूजा, अर्चना करनी चाहिए |
जो भी व्यक्ति भक्तिभाव से शिवलिंग की पूजा उपासना करते हैं | उनके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं |
ऐसे व्यक्ति पाप कर्मों से निरत हो जाते हैं |
भगवान शंकर के लिंग एवं मूर्ति की नित्यप्रति सेवा उपासना के द्वारा व्यक्ति इस भवसागर को पार कर जाते हैं | और शिवपद के अधिकारी बन जाते हैं |

भगवान विष्णुजी के ऐसा कहने पर देवताओं ने भगवान श्रीहरि को नमन किया |
और हाथ जोड़कर भगवान विष्णुजी से समस्त कामनाओं की पूर्ति करने वाले शिवलिंग उन सबको प्रदान करने की प्रार्थना की |
देवताओं के द्वारा प्रार्थना करने पर भगवान विष्णुजी ने विश्वकर्मा को बुलाकर देवताओं की उपासना हेतु सुन्दर,सुन्दर शिवलिंगों का निर्माण कराया |
और सभी देवताओं को शिवजी की सेवा, पूजा आराधना, स्तुति हेतु सुन्दर शिवलिंग प्रदान कर दिये |

तब भगवान शंकर जी को प्रसन्न करने हेतु इन्द्र को पद्मराग मणि , कुबेर को सुवर्णमय लिंग, भगवान विष्णुजी को इन्द्रनीलमय ,
ब्रह्मा जी को हेममय लिंग, दोनों अश्विनीकुमारों को पार्थिव लिंग, लक्ष्मी जी को स्फटिकमय, आदित्यगण को ताम्रमय, अग्निदेव को वज्र के लिंग एवं अन्य अनेक देवताओं को भगवान शिवजी की उपासना करने हेतु विभिन्न,भिन्न विश्वकर्मा के द्वारा बनाये हुये शिवलिंग प्रदान किये गए थे |

इसी प्रकार ब्राह्मण मिट्टी के बने शिवलिंग, देवी मक्खन के बने हुये शिवलिंग की, योगीजन भस्ममय लिंग की, बाणासुर पारद शिवलिंग की सर्व कामार्थ सिद्धि के लिए ये सभी देवी देवता भगवान शिवजी की पूजा अर्चना करते हैं |

शिव जी के निष्कल निराकार रूप होने के कारण उनकी सेवा, पूजा आदि शिवजी के निराकार रूप लिंग के द्वारा की जाती है |
अर्थात ~ शिवलिंग भगवान शिवजी के निराकार रूप का प्रतीक है |
भगवान शिवजी के सकल साकार होने के कारण उनके विग्रह की पूजा सेवा की जाती है |
अर्थात ~ शिवजी का साकार विग्रह उनके साकार स्वरूप का प्रतीक होता है |
पुराणों के अनुसार भक्त वत्सल दीन दयालु भगवान बाबा भोले भण्डारी की षोडशोपचार द्वारा सेवा, पूजा, ध्यान साधना आदि कार्यों के द्वारा देव, दनुज, मनुष्य इन सभी को बाबा की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए |
इस प्रकार भगवान विष्णुजी ने सभी देवताओं को उनके हित की कामना से सुन्दर शिवलिंग का निर्माण करके दिये |
भगवान विष्णुजी ने समस्त देवों को भगवान शिवजी को प्रसन्न करने के लिए पूजन सम्बन्धी विधि भी बतायी थी | यह पूजन विधि समस्त कामनाओं की सिद्धि करने वाली है |
यह पूजन विधि भोग और मोक्ष को प्रदान करने वाली है |

समस्त जीवों में मनुष्य जन्म प्राप्त करना बहुत दुर्लभ होता है |
यदि मानव का उत्तम आचारवान ब्राह्मण कुल में,सदाचारी वैश्य कुल में जन्म होता है तो यह अवश्य ही उसके पूर्वजन्मों के पुण्य का फल होता है |
शास्त्रों में बताये गये कर्मानुसार ही व्यक्ति को अपने कर्म का अनुष्ठान वर्ण एवं जाति के द्वारा करना चाहिए |
हमारे शास्त्रानुसार हजारों कर्ममय यज्ञ से बढकर तपयज्ञ को माना जाता है |
भक्ति साधना के लिए ध्यानादि सूक्ष्म क्रियाओं से बढकर कोई अन्य साधन नहीं होता |

शिवपुराण में वर्णन मिलता है कि ~

” ध्यानयज्ञात्परं नास्ति ध्यानं ज्ञानस्य साधनम् |
यतः समरसं स्वेष्टं योगी ध्यानेन पश्यति ||”

अर्थात ~
ध्यान ही ज्ञान का साधन कहलाता है |
योगी, संत, रिषी, आदि ध्यान के द्वारा ही समरस शिव का साक्षात्कार करते हैं |

व्यक्ति को एकाग्रचित्त होकर भक्तिभाव के साथ देवों के देव महादेव की भक्ति उपासना को करना चाहिए |
व्यक्ति को जब तक ज्ञान की प्राप्ति न हो तब तक भगवान आशुतोष की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए भोले भण्डारी बाबा की सेवा, आराधना में लगे रहना चाहिए |
इस संसार में अनेकानेक लोगो और पदार्थों के रूप में एक परम पिता परमात्मा ही अनेक रूपों में अभिव्यक्त हो रहा है |
जैसे कि प्रत्यक्ष नारायण भगवान भुवन भास्कर एक ही स्थान में रहकर भी विभिन्न वस्तुओं में अलग, अलग प्रतीत होते हैं |
शिवजी की उपासना करने वाले साधक को अपना मन परमात्मा शिव की उपासना में लगाये रखना चाहिए |
और चिन्तन करते हुये समझना चाहिए कि इस संसार में सत या असत सुनने और देखने वाली प्रत्येक वस्तु परब्रह्म शिवरूप ही है |

जिस प्रकार मैले कपड़े पर रंग भली भाँति नहीं चढता है | किंतु जब मैले कपड़े को धोकर स्वच्छ कर लिया जाता है तो उस पर सभी रंग बहुत अच्छी तरह से चढ जाते हैं |
इसी प्रकार देवताओं की भलीभाँति पूजा, सेवा, उपासना, साधना आदि से यह मानव शरीर पूर्णतया निर्मल हो जाता है |
तभी इस त्रिविध शरीर के निर्मल हो जाने पर विज्ञान प्रकट होता है |
विज्ञान की प्राप्ति हो जाने से व्यक्ति के मन का भेदभाव मिट जाता है |
भेदभाव मिट जाने पर व्यक्ति के अन्तर्मन के दुख द्वन्द आदि क्लेश विकार दूर हो जाते हैं |
यह दुख द्वन्द विकार आदि दूर हो जाने पर व्यक्ति शिवरूर हो जाता है |

हमारे पुराण, ग्रन्थ आदि में वर्णन मिलता है कि
प्रत्येक गृहस्थ धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति को अपने जीवन में उन्नति करने हेतु एवं सुख शांतिपूर्ण जीवन के लिए पंच देवताओं की उपासना के साथ ही भगवान शिव की प्रतिमा का प्रेमपूर्वक पूजन करना चाहिए |
भगवान भोलेनाथ की पूजा उपासना सब देवों से बढकर है | क्योंकि जिस प्रकार किसी भी वृक्ष के मूल को सींचने पर सम्पूर्ण वृक्ष के पत्ते, पत्ते तक स्वतः ही पूर्ण वृक्ष की तृप्ति हो जाती है |
उसी प्रकार सम्पूर्ण मंगलों के मूल परमात्मा परम कल्याणकारी महादेव शिवशम्भु भोले भण्डारी बाबा समस्त प्राणियों की अभीष्ट मनोकामनाओं की सिद्धि कर देते हैं |

✍ सीमा गर्ग मंजरी
मेरठ कैंट उत्तर प्रदेश

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